जब फलदार पेड़ बढ़ेंगे, तब ही गौरैया लौटेगी; और जब गौरैया लौटेगी, तब ही प्रकृति मुस्कुराएगी।

विकास की आंधी में उजड़ते फलदार वृक्ष गुम होती गौरैया

“गौरैया की वापसी का रास्ता,फलदार वृक्षों से हरियाली और जीवन”



आज शहरों की सुबह पहले जैसी नहीं रही। कभी घरों के आंगन, खिड़कियों और छतों पर चहकने वाली गौरैया व अन्य पंछी अब धीरे-धीरे हमारी जिंदगी से विलुप्त होती जा रही है। उसकी मधुर आवाज, जो कभी सुबह की पहचान हुआ करती थी, अब बहुत कम सुनाई देती है। यह केवल एक पक्षी के गायब होने की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे पर्यावरण और जीवनशैली में आए असंतुलन का संकेत है।

मेरे विचार से गौरैया और अन्य पक्षियों के कम होने का सबसे बड़ा कारण है,फलदार वृक्षों की लगातार घटती संख्या। पहले हमारे आसपास आम, अमरूद, जामुन, बेर, आंवला जैसे पेड़ों की भरमार होती थी उन पर गिलहरियों को खुद आता हुआ हम अक्सर देखा करते थे। ये पेड़ केवल छाया या फल देने तक सीमित नहीं थे, बल्कि ये एक पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के आधार थे। इन पेड़ों पर छोटे-छोटे कीट पनपते थे, जो गौरैया और अन्य पक्षियों का मुख्य भोजन होते थे। साथ ही, इनकी शाखाएं पक्षियों को सुरक्षित घोंसला बनाने के लिए उपयुक्त स्थान देती थीं।

लेकिन आज का शहरी विकास इस प्राकृतिक संतुलन के खिलाफ खड़ा दिखाई देता है। तेजी से बढ़ते कंक्रीट के जंगलों, बहुमंजिला इमारतों और सीमित हरित क्षेत्रों ने इन पेड़ों की जगह ले ली है। नई कॉलोनियों में सजावटी पौधों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि फलदार वृक्षों को नजरअंदाज किया जा रहा है। इसका सीधा असर पक्षियों की संख्या पर पड़ा है।

यदि हम उत्तर प्रदेश की स्थिति पर नजर डालें, तो यह समस्या और स्पष्ट हो जाती है। वर्ष 2000 के आसपास राज्य में फलदार वृक्षों का क्षेत्रफल लगभग 9 से 10 लाख हेक्टेयर के बीच थी। यह संख्या राज्य की समृद्ध बागवानी परंपरा को दर्शाती थी। लेकिन 2020 के बाद, शहरीकरण और भूमि उपयोग में बदलाव के कारण यह क्षेत्रफल घटकर लगभग 7 से 8 लाख हेक्टेयर तक सिमट गया यानी दो दशकों में लाखों हेक्टेयर क्षेत्रफल में कमी आई है।

हालांकि सरकार द्वारा राष्ट्रीय बागवानी मिशन और विभिन्न वृक्षारोपण अभियानों के माध्यम से इस स्थिति को सुधारने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि शहरी क्षेत्रों में फलदार वृक्षों की संख्या में गिरावट अभी भी जारी है। विशेष रूप से लखनऊ जैसे तेजी से विकसित होते शहरों में यह समस्या अधिक गंभीर रूप ले चुकी है।

लखनऊ, जो कभी अपने बाग-बगीचों और हरियाली के लिए जाना जाता था, आज वहां पुराने बगीचे तेजी से समाप्त हो रहे हैं। नई आवासीय योजनाओं और व्यावसायिक परियोजनाओं में हरियाली तो दिखाई देती है, लेकिन उसमें फलदार पेड़ों का स्थान बहुत सीमित हो गया है। कई क्षेत्रों में फलदार वृक्षों का प्रतिशत 30 से 40 प्रतिशत तक घट चुका है। सड़क के चौड़ीकरण और ओवरब्रिज और हाईवे के लगातार निर्माण के कारण सैकड़ो फलदार वृक्षों की कटाई विकास की मांग हो गई है।

यह स्थिति केवल पेड़ों की संख्या में कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के कमजोर होने का संकेत है। कौआ,बुलबुल, मैना, तोता और अन्य छोटे पक्षी भी इसी कारण अपने प्राकृतिक आवास खो रहे हैं। भोजन की कमी, सुरक्षित घोंसलों की अनुपलब्धता और बढ़ते प्रदूषण ने इनके अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है।

यदि यह स्थिति इसी तरह बनी रही, तो आने वाले समय में हमारी अगली पीढ़ी शायद गौरैया को केवल किताबों और तस्वीरों में ही देख पाएगी। इसलिए अब समय आ गया है कि हम इस दिशा में गंभीरता से सोचें और ठोस कदम उठाएं।

मेरे विचार से समाधान बहुत कठिन नहीं है, बस इसके लिए सामूहिक प्रयास और जागरूकता की आवश्यकता है। सबसे पहला कदम यह होना चाहिए कि हर घर, हर मोहल्ले और हर संस्था में कम से कम एक फलदार वृक्ष अवश्य लगाया जाए। आम, अमरूद, नींबू, अनार जैसे पेड़ आसानी से लगाए जा सकते हैं और यह पर्यावरण के लिए भी अत्यंत लाभकारी होते हैं।

सरकारी स्तर पर भी यह जरूरी है कि वृक्षारोपण योजनाओं में केवल सजावटी पौधों तक सीमित न रहकर फलदार वृक्षों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। स्कूलों और कॉलेजों में “एक छात्र–एक फलदार पेड़” जैसे अभियान चलाकर बच्चों को प्रकृति से जोड़ने का प्रयास किया जा सकता है। इससे न केवल पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि बच्चों में जिम्मेदारी की भावना भी विकसित होगी।

आज के समय में, जब शहरी क्षेत्रों में जगह की कमी है, तब छतों और बालकनियों का उपयोग भी किया जा सकता है। गमलों में छोटे फलदार पौधे लगाकर भी हम इस दिशा में योगदान दे सकते हैं। इसके साथ ही, पक्षियों के लिए पानी के छोटे बर्तन और दाना रखने की व्यवस्था भी करनी चाहिए, ताकि उन्हें भोजन और पानी की कमी न हो।नेटिव जैव विविधता जैसी विकास परियोजनाओं से होने वाले नुकसान से अधिक जैव विविधता को वापस हासिल करना उद्देश्य बनाना होगा। सस्टेनेबल डेवलपमेंट के तहत सीमित मात्रा में ऐसे संसाधनों का उपयोग किया जाए जो अब प्रकृति में खत्म होने के कगार में है ताकि हमारी पीढ़ियां भी उन वस्तुओं से अवगत हो पाए।प्राकृतिक पूंजी प्रकृति (वन, पानी, हवा) को एक संपत्ति के रूप में मानना जो हमें सेवाएं देती है और जिन्हें सुरक्षित अवस्था में हमें आने वाली पीढियां को सौंपना चाहिए।रिवाइल्डिंग संकल्पना के तहत पारिस्थितिक तंत्र को उनकी प्राकृतिक, स्व-सस्टेनेबल स्थिति में बहाल करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। आज पृथ्वी में ऑक्सीजन का एकमात्र स्रोत वृक्ष ही बचे हैं यदि हमें जीवित रहना है हमारी प्रकृति को बचाना है तो हमें ऑक्सीजन के उत्सर्जन का भी ध्यान रखना चाहिए क्योंकि हम लेते तो ऑक्सीजन है पर जीव जंतु सभी कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं फिर कल्पना करिए यदि पेड़ न होंगे,इतनी बड़ी जनसंख्या के सांस लेने के लिए ऑक्सीजन कहां से आएगी?

समाज के प्रत्येक व्यक्ति को यह समझना होगा कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह हम सभी का कर्तव्य है। यदि हम अपने आसपास हरियाली बढ़ाएंगे, तो इसका लाभ हमें ही मिलेगा,स्वच्छ हवा, बेहतर जलवायु और जैव विविधता के रूप में।

      खतरनाक गैसों से प्रकृति की रक्षा के लिए नेट ज़ीरो कार्बन संकल्पना है जिसका अर्थ है वातावरण में छोड़ी जाने वाली ग्रीनहाउस गैसों और वातावरण से हटाई गई गैसों के बीच संतुलन बनाना। इसका मतलब उत्सर्जन को पूरी तरह शून्य करना नहीं, बल्कि उत्सर्जित कार्बन को वनीकरण या तकनीकी उपायो से अवशोषित करना है, ताकि कुल प्रभाव शून्य हो। भारत ने 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य रखा है।

इस दिशा में शासन प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के द्वारा प्रयास लगातार करते रहना चाहिए सरोजिनी नगर विधानसभा में वहां के विधायक डॉ राजेश्वर सिंह ने नेता जीरो सरोजिनी नगर बनाने का संकल्प लिया और विधानसभा में लगातार फलदार वृक्षों की वृक्षारोपण करवा रहे है और वहां के निवासियों को भी प्रोत्साहित कर रहे हैं। स्पष्ट संदेश है कि यदि विकास की इस दौड़ में हम लगातार फलदार 1आवृक्षों को लगाते चलेंगे तो आने वाले समय में पशु पक्षी और हमारी पीढ़ियां स्वतंत्र रूप से कार्बन की उपलब्धता और प्रकृति की सुंदरता का उपयोग कर सकेंगे।

 आज के समय में यह कहना उचित होगा कि गौरैया की वापसी केवल एक पक्षी की वापसी नहीं होगी, बल्कि यह हमारे पर्यावरण के संतुलन और हमारी संवेदनशीलता की वापसी होगी।

जब फलदार पेड़ बढ़ेंगे, तब ही गौरैया लौटेगी;

और जब गौरैया लौटेगी, तब ही प्रकृति मुस्कुराएगी।

@एक विचार 

रीना त्रिपाठी

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