मनुष्य स्वयं ही अपना सबसे बड़ा मित्र है और स्वयं ही अपना सबसे बड़ा शत्रु है।
संघर्षों की तपिश से निकली सफलता की रोशनी जब गीता बनी जीवन की गुरु और शिक्षा बना समाज परिवर्तन का संकल्प, सुकीर्ति गुप्ता की प्रेरक कहानी "उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥" (श्रीमद्भगवद्गीता 6.5) अर्थ : मनुष्य को स्वयं अपने प्रयासों से अपना उत्थान करना चाहिए, स्वयं को गिराना नहीं चाहिए। मनुष्य स्वयं ही अपना सबसे बड़ा मित्र है और स्वयं ही अपना सबसे बड़ा शत्रु है। कुछ व्यक्तित्व मंचों की चकाचौंध से नहीं, बल्कि अपने कर्मों की उजली आभा से पहचाने जाते हैं। वे शोर नहीं मचाते, बल्कि अपने संघर्ष, सादगी, सेवा और संस्कारों से समाज में परिवर्तन की ऐसी मौन क्रांति का सूत्रपात करते हैं, जिसकी गूँज वर्षों तक सुनाई देती है। सुकीर्ति गुप्ता ऐसी ही प्रेरणादायी शिक्षिका हैं, जिनका जीवन केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों का वृत्तांत नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, अध्यात्म, शिक्षा और राष्ट्र निर्माण के संकल्प का जीवंत दस्तावेज़ है। आज जब शिक्षा का अर्थ अक्सर केवल डिग्रियों, अंकों और प्रतियोगी परीक्षाओं तक सीमित होता जा रहा है, तब सुकीर्ति गुप्ता शिक्षा को चरित्...