स्कूल के बाहर 'थमा' राष्ट्रगान, पर नहीं थमे अभिभावकों के कदम: क्या बच्चों को हम यही संस्कार दे रहे हैं?
स्कूल के बाहर 'थमा' राष्ट्रगान, पर नहीं थमे अभिभावकों के कदम: क्या बच्चों को हम यही संस्कार दे रहे हैं?
यह सुबह का वह पावन समय होता है जब देश के भविष्य, यानी हमारे बच्चे, स्कूलों में एक सुर में जन-गण-मन गा रहे होते हैं। पूरा परिसर राष्ट्रभक्ति के गौरव से ओतप्रोत होता है। ठीक इसी समय स्कूल के मुख्य द्वार पर एक ऐसी तस्वीर देखने को मिलती है, जो हर सच्चे नागरिक को सोचने पर मजबूर कर देती है।
अक्सर देखा जाता है कि सुबह की प्रार्थना और राष्ट्रगान शुरू होने के बाद भी कुछ अभिभावक अपने बच्चों को छोड़ने स्कूल पहुंचते हैं। जैसे ही कानों में राष्ट्रगान की धुन पड़ती है, नियम और मर्यादा के मुताबिक पैर वहीं ठहर जाने चाहिए। लेकिन, कुछ अभिभावक राष्ट्रगान के प्रति निष्ठा दिखाना तो दूर, बिना रुके बच्चों को अंदर धकेलते हैं और खुद तुरंत गाड़ी मोड़कर वापस चल देते हैं।
जैसा बोएंगे, वैसा ही काटेंगे
मनोवैज्ञानिक और शिक्षक हमेशा कहते हैं कि बच्चे वही नहीं सीखते जो हम उन्हें सिखाते हैं, बल्कि वह सीखते हैं जो हम खुद करते हैं। जब एक मासूम बच्चा अपने माता-पिता को राष्ट्रगान का अनादर करते हुए, बिना रुके आगे बढ़ते देखता है, तो उसके बाल-मन पर यही छप जाता है कि देश के इस सबसे बड़े सम्मान की कोई अहमियत नहीं है।
मनोवैज्ञानिक और शिक्षक हमेशा कहते हैं कि बच्चे वही नहीं सीखते जो हम उन्हें सिखाते हैं, बल्कि वह सीखते हैं जो हम खुद करते हैं। जब एक मासूम बच्चा अपने माता-पिता को राष्ट्रगान का अनादर करते हुए, बिना रुके आगे बढ़ते देखता है, तो उसके बाल-मन पर यही छप जाता है कि देश के इस सबसे बड़े सम्मान की कोई अहमियत नहीं है।
एक छोटी सी लापरवाही, बड़ा नुकसान
काम की जल्दी या दफ्तर पहुंचने की आपाधापी अपनी जगह हो सकती है, लेकिन क्या वह देश के सम्मान के उन 52 सेकंड से भी ज्यादा कीमती है? अगर हम आज अपने बच्चों के सामने खुद मिसाल नहीं बनेंगे, तो कल उनसे राष्ट्रभक्त होने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
काम की जल्दी या दफ्तर पहुंचने की आपाधापी अपनी जगह हो सकती है, लेकिन क्या वह देश के सम्मान के उन 52 सेकंड से भी ज्यादा कीमती है? अगर हम आज अपने बच्चों के सामने खुद मिसाल नहीं बनेंगे, तो कल उनसे राष्ट्रभक्त होने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
यह खबर एक चेतावनी है हम सभी माता-पिता के लिए। राष्ट्रगान के दौरान सिर्फ 52 सेकंड के लिए ठहर जाना, न सिर्फ देश के प्रति हमारा कर्तव्य है, बल्कि हमारे बच्चों के लिए सबसे बड़ा नैतिक पाठ भी है। आइए, जिम्मेदारी निभाएं और बच्चों को सही मायने में संस्कारी बनाएं।

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